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महोदय, भारत ही नहीं, सारी दुनिया आज विज्ञान और प्रौद्योगिकी के द्वारा लाए गए परिनर्तनों के कारण महान परिवर्तनों की ड्योढ़ी पर ख़ड़ी है। इन चीजों ने लोगों के जीवन को बदला तो है, किंतु केवल ऊपरी तौर पर। आज हमारे पास ऊँची-ऊँची और सुंदर इमारतें हैं। खेतीबाड़ी के कुछ आधुनिक तरीके भी हमें मालूम हैं। लेकिन आज हमें एक नए प्रकार के मानव की अवश्यकता है। ऐसा मानव जो विस्तारशील ज्ञान को वास्तविक उच्च जीवन के लिए उपयोग कर सके। मेरे विचार से गांधी जी ने यही करने का प्रयत्न किया एक मानव निर्माण करने का। (100) मैं नहीं कह सकती कि मनुष्य का स्वाभाव जैसा है उसे देखते हुए आज की दुनिया में ऐसा करना संभव होगा या नहीं, किंतु इस दिशा में प्रयत्न करना उपयुक्त होगा और केवल बुद्धजीवी ही इस तरह कार प्रयत्न और दूसरों का मार्गदर्शन कर सकते है। आज दुनिया बहुत छोटी हो गई है और हम अलग-अलग खानों में बँटकर नही रह सकते। हमें अपने लक्ष्य प्राप्ति के लिए कहीं अधिक एक होकर रहने की आवश्यकता है। हम लोकलंत्र में विश्वास करते है, एक तो संसदीय प्रणाली की सरकार के अर्थ में, दूसरे उस तरीके से जिस तरीके से हम अपनी पार्टी में और (200) अन्यत्र काम करते हैं। पर लोकतंत्र रूपी हमारा ताजा पानी कभी-कभी जातिवाद, सांप्रदायिकता, और सामाजिक रीति-रिवाजों इत्यादि के सड़ते गढ़ों में बंद हो जाता है। आपके पास लोकतंत्र है, आपके पास वोट देने का अधिकार है, या आप अपने विचारों को खुलकर प्रगट कर सकते हैं इन सबके तब तक कुछ अर्थ नही होते जब तक आप इस प्रक्रिया से सामाजिक जीवन में परिवर्तन की नई धाराएँ उत्पन्न नहीं कर देते, जो हमारे लोगों के हर वर्ग और स्तर में समा जाएँ। प्रस्ताव पास कर देना बहुत सरल है, पर उसका कार्यान्वयन करना सरल नहीं। हम जानते हैं कि स्थिति या पद (300)में कुछ लोगों का निहित स्वार्थ हो जाता है और कुछेक का किन्हीं दूसरी चीजों में। लोकिन सबसे बड़ा निहित स्वार्थ भय जो जाना पहचाना है, उसे परिवर्तन करने का भय। हम जानते हैं कि अमुक चीज बुरी है, फिर भी हम उसे परिवर्तित करने से डरतें हैं। लेकिन आज हम इस तरह बड़े-बड़े, परिवर्तनों के बिना वास्तव में जीवित ही नहीं रह सकते। हम परिवरितन लाएँ कैसे? हम लोगों को इस बात का कैसे विश्वास दिलाएँ कि परिवर्तन आवश्यक है। महोदय, पिछले कुछ वर्षों में सभी राजनीतिक दल किसी-न-किसी तरह से जनता से दूर हो गए हैं। आज हम और आप दोनों को अपनी जोड़ों को फिर से जमाना होगा। जनता से प्रेरणा लेनी होगी। हमें जनता की आकांक्षाओं, उसकी माँगों और उसकी आवश्यकताओं के अनुसार चलना होगा। अपने देश के विशाल आकार के कारण यह बहुत बड़ा काम है। लेकिन उस आदमी के लिए कुछ भी असंभव नहीं जिसने कुछ करने के लिए कमर कस ली हो। कुछ देशों में लोग चढ़ने के लिए पहाड़ों की ऊँटी-से ऊँटी चोटोयों की तलाश में रहते हैं, ताकि उनके और काम (100) कि चुनौतीयों का समाधान हो सके। कुछ दूसरे छोटी-छोटी नावों में सागरों और महासागरों को पार करने के लिए निकल पड़ते हैं। ये सब असाधरण उद्यम हैं। किंतु हमारी चुनौतीयाँ तो हमारे दरवाजे पर ही दस्तक दे रही है। हमें ऊँचे-ऊँचे पर्वतों पर या गहरे सागरों तक जाने की आवश्यकता नही। हमारे हर गाँव में गरीबी है और घर-घर में जात-पात है। ये वे परिवर्तित है जिन पर हमें चढ़ना है और ये वे महासागर हैं जिन्हें हमें पार करना है। मुझे मालूम है कि हममें वह शक्ति है। मैं जानती हूँ कि हममें क्षमता है। केवल प्रश्न है करने (200) का और मैं आशा करती हूँ कि यह सम्मेलन उस दिशा में ले जाने वाला एक छोटा-सा कदम होगा। आदमी के चंद्रमा पर पहुँचने के बाद किसी ने कहा था कि वह कदम रखने वाले के लिए छोटा-सा कदम है, किंतु मानव जाति के लिए बहुत बड़ा कदम था। अतः मेरे विचार से आप कह सकते है कि आपके लिए यह छोटा कदम होगा, लेकिन यदि आप सफल हुए, तो भारत के लिए यह महान कदम होगा। मै आशा करती हूँ कि आप इसे ध्यान में रखेंगे और दूसरों में उत्साह पैदा कर सकेंगे, क्योकि किसी भी तरह की उपलब्धि (300) के रास्ते में सबसे बड़ी बाधाओँ में से एक है हमारे बुद्धिजीवियों, हमारे पत्रकारों इत्यादि में व्याप्त अविश्वास या संदेहवृत्ति। इस बाधा को हटाना होगा। हमें अपने उत्साह को पुनः स्थापित करना होगा और उससे उत्पन्न होगा वह साहस, धैर्य और संकल्प-शक्ति जो उन बहुत-सी चीजों को प्राप्त करने के लिए आवश्यक है जो हमें प्राप्त करनी ही चाहिए। जब कभी राजनीतिक जीवन और बौद्धिक जीवन में निकट का संबंध रहा है, तो दोनों को लाभ पहुँचा है। सभापति महोदय, जो रिपोर्ट मद्य-निषेध के संबंध में सदन के सामने प्रस्तुत हुई है, मैं उसके संबंध में अपने विचार रखने जा रहा हूँ। इस रिपोर्ट के दो भाग हैं, इन दोनों भागों में बहुत-सी बातों का वर्णन किया गया है। बहुत सारी विवेचना इस रिपोर्ट के अंदर है। मैं इसके विस्तार में जाना नहीं चाहता हूँ लोकिन कुछ ठोस और विशेष बातें आपके सामने रखना चाहता हूँ। पहली बात तो यह है कि क्या नशाबंदी हमारे लिए आवश्यक है? क्या यह आवश्यक है कि हम मद्यपान न करें? इस पर ध्यान देने से आपको पता चलेगा कि जो भी (100) काम हम अपने हाथ में लेतें हैं चाहे वह खेती का हो, व्यापर का हो या यांत्रिक युग और विज्ञान का हो उसके लिए आवश्यक हो कि आदमी का मस्तिष्क ठीक तरह से काम करे। अगर मस्तिष्क का संतुलन बिगड़ जाता है तो वह उस को ठीक तरह से कर नहीं सकता। और यह शाराब एक ऐसी चीज है जो कि व्यक्ति के मस्तिष्क का संतुलन खो देती है। इसीलिए हमारे देश में हमारे नेताओं ने यह आवश्यक समझा ता कि अगर इस देश में सामाजिक और आर्थिक जीवन का संतुलन ठीक रखना है, लोगों को किसी चीज का ज्ञान देना है, (200) किसी चीज को उन्हे सिखलाना है ते उसके लिए आवश्यकत है कि इंसान का दिमाग ठीक रहे और इसीलिए नशाबंदी का होना बहुत ही आवश्यक है। इस बात का प्रचार स्वतंत्रता के पहले और बाद में भी किया गया। यदि हम धार्मिक ग्रंथों को देखें, हिंदू धर्म के वेद तथा शास्त्रों को देखें, ईसाइयों की बाइबिल को देखें या मुसलमानों की पवित्र कुरान को देखें तो किसी ग्रंथ में भी इस प्रकार की विचारधारा नही है कि आदमी शराब पिए। हर स्थान पर इसका खंडन किया गया है। तभी महापुरुषों ने, चाहे वे लोकमान्य तिलक हों या महात्मा गांधी जी हों (300) जो कि इस देश के सामाजिक और राष्ट्रीय जीवन के लिए अग्रसर थे, उन्होंने भी इस बात का खंडन किया है और कहा है कि नशा इंसान के लिए कोई अच्छी चीज नहीं है और इसलिए उसका उपयोग नही करना चाहिए। मैं आपके द्वारा इस सदन का ध्यान दिलाऊँगा कि शाराबबंदी को जहाँ-जहाँ भी ढील दी गई है, वहाँ पर देखने से पता चलता है कि हालत कितनी खराब हुई है। (374/1763)
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